स्वतंत्र

जिस दिन आपकी आवाज़ खत्म हो जाएगी
समझ लीजिए आप खत्म हो जाएंगे,
अतः अपनी आवाज़ को स्वतंत्र रखें 
किसी का गुलाम ना बनने दें।

भारतीय

अब,
जय हिंद! जय भारत!
की नहीं
मैं हिंद ! मैं भारत!
की आवश्यकता है।

एक भारतीय के सच्चे विचार।
✍️राhuल 🇮🇳

हार मत मानो

'लक्ष्य के सामने हार मत रखना,
क्योंकि जीत का कोई विकल्प नही होता'।

Lockdown

कुछ लोग सोच रहे हैं कि Lockdown
खुले तो हम घर से बाहर जाएं और
कुछ लोग सोच रहे हैं कि
Lockdown
खुले तो हम अपने घर जाएं।

विश्वास


जब अपनों से ज्यादा 'गैरों' पर विश्वास होने लगे तो उनका अंत इसी प्रकार होता है।  

प्यारी बहना

प्यारी बहन

'सबसे पहले हम आपको एक बात बताना चाहते हैं कि सिस्टर कैसी भी हो वह आपकी एक प्यारी बहन होती है'। वह आपसे कितनी भी लड़ाई क्यों ना करती हो, लेकिन वो आपकी बहन है और भाई-बहन में लड़ाई झगड़ा प्यार हंसी मजाक तो होता ही रहता है पर आपको उसकी कमी उस दिन महसूस होगी जिस दिन उसकी शादी हो जाएगी। मुझे भी होती है मेरी भी बहन अपने ससुराल में रहती हैं और वो जब घर आती हैं तो मानो घर मेरा खुशी से झूम उठता है और सबसे ज्यादा खुश मैं होता हूँ। बहन की कमी उसकी विदाई के वक़्त समझ आती है । इसीलिए कभी भी अपनी सिस्टर की कोई भी बात को दिल पर ना लगाएं और हमेशा खुशी-खुशी रहे । तो मैं आपको अपने कुछ चन्द पंक्तियों में बहन के बारे में कुछ बताता हूँ।

आज दिन बहुत खास हैं, बहन के लिए कुछ मेरे पास है
तेरे सुकून के खातिर ओ मेरी बहना, तेरा भाई हमेशा तेरे आस-पास है।

बड़े ही अदब और प्रेम से लिखा, बहना तेरा और मेरा रिश्ता,
दूर होकर भी तू दिल में रहती, तेरी यादे खुशियों की लहर सी बहती है।

बचपन में शरारत करने का इरादा न होता, मेरी प्यारी बड़ी दीदी
तुम ना होती तो बचपन इतना प्यारा न होता।
तुम्हारी शादी हो गई तो क्या हुआ,
तुम कल भी थी, तुम आज भी हो, और कल भी रहोगी,
वो मेरी प्यारी बहन थी, जिंदगी भर मेरी प्यारी बहन ही रहेगी।

आपका भाई-  राहुल पाल

बिटिया रानी

बिटिया रानी

आज सदी में भी बहुत से लोग बेटी को बोझ समझते हैं लेकिन बेटी मतलब एक प्यारी सी मुस्कान, बेटी मतलब पापा का गुमान,बेटी मतलब खिलखिलाता फुल, बेटी मतलब अपना भविष्य और क्या कहे बेटी मतलब क्या होती हैं। वो तो बस वाही जानता हैं जिसे बेटी होती हैं। आज हम अपनी देश की सारी बेटियों के लिए कुछ पंक्ति लिख रहे हैं।ताकि हर किसी को बेटियों का महत्व पता चले।

बेटी की प्यार को कभी आजमाना नहीं,
वह फूल है, उसे कभी रुलाना नहीं,
पिता का तो गुमान होती है बेटी,
जिन्दा होने की पहचान होती है बेटी,

उसकी आंखें कभी नम न होने देना,
उसकी जिन्दगी से कभी खुशियां कम न होने देना ,
उन्गली पकड़ कर कल जिसको चलाया था तुमने,
फ़िर उसको ही डोली में बिठाया था तुमने,

बहुत छोटा सा सफ़र होता है बेटी के साथ,
बहुत कम वक्त के लिये वह होती हमारे पास…!!
असीम दुलार पाने की हकदार है बेटी,
समझो भगवान् का आशीर्वाद है बेटी
धन्यवाद!


आपका दोस्त- राहुल पाल

बेटी पराया धन

बेटी को पराया धन क्यों कहा जाता है।

बेटियां घर की रौनक होती हैं और माता-पिता के दिल के बेहद करीब भी होती हैं। उस पर भी जब मेरे जैसे लड़के के घर बेटी का जन्म हो और वो इस रिश्ते को शब्दों में ना ढाले, यह असंभव है इसलिए पेश हैं सभी  बेटियों पर लिखे चुनिंदा शेर जिनमें शायरियों के माध्यम से अपने जज़्बातों का इज़हार किया है।

घर में रहते हुए ग़ैरों की तरह होती हैं
बेटियाँ धान के पौधों की तरह होती हैं

उड़के एक रोज़ बड़ी दूर चली जाती हैं
करके इस नरम दिल को पत्थर
बेटियां अपने ससुराल चली जाती  हैं

ऐसा लगता है कि जैसे ख़त्म मेला हो गया
उड़ गईं आँगन से चिड़ियाँ घर अकेला हो गया

जब ससुराल से मायके आ के बेटी मुस्कुराती है
तो माँ-बाप के जान में जान आती है।


घरों में यूँ सयानी बेटियाँ बेचैन रहती हैं
कि जैसे साहिलों पर कश्तियाँ बेचैन रहती हैं

मेरी बेटी से...
ये चिड़िया भी मेरी बेटी से कितनी मिलती जुलती है
कहीं भी शाख़े- गुल देखे तो झूला डाल देती है

हे भगवान तू अगर बेटियाँ नहीं लिखता
तो समझ घर में खिड़कियाँ नहीं लिखता


घर में जब बेटियाँ नहीं होंगी
तो समझो
पेड़ पर टहनियाँ नहीं होंगी


और अब बेटियो के बारे में लफ़्ज़ों में क्या बयाँ करूँ बस ये समझ लो बेटिया घर की लक्ष्मी है। हे भगवान बेटियाँ भी उन्हें ही देना जिसे इन्हें पालने की औकात हो। बगैर बेटियों के घर जैसे काटने को दौड़ता है, ना जाने वो कौन लोग होते हैं जिन्हें बेटियोँ से नफरत है आखिर क्यों।
हे भगवान मुझे इतना काबिल बनाना की मेरे लफ्ज़ से मेरी या किसीकी बहनों को बुरा ना लगे और मैं हर उस लड़की की भी इज़्ज़त कर सकूँ जिस बहन को भाई नसीब नही है , और उसका भाई बनके उसको बहन स्वीकारने की क्षमता देना।

आपका दोस्त-  राहुल पाल

गरीब vs अमीर

गरीब vs अमीर

  • ●जो गरीबी में एक दिया भी न जला सका
    एक अमीर का पटाखा उसका घर जला गया


    ●अमीर की बेटी पार्लर में जितना दे आती है
    उतने में गरीब की बेटी अपने ससुराल चली जाती है


    ●मैं कड़ी धूप में चलता हूँ इस यकींन के साथ
    मैं जलूँगा तो मेरे घर में उजाले होंगे


    ●जरा सी आहट पर जाग जाता है वो रातो को
    ऐ खुदा गरीब को बेटी दे तो दरवाज़ा भी दे



    ●तहजीब की मिसाल गरीबों के घर पे है
    दुपट्टा फटा हुआ है मगर उनके सर पे है


    ●चेहरा बता रहा था के मारा है भूख ने
    सब कह रहे थे के कुछ खा के मर गया

    ●जब भी देखता हूँ किसी गरीब को हँसते हुए
    तो यकीन आ जाता है
    की खुशियो का ताल्लुक दौलत से नहीं होता


    ●गरीबों के बच्चे भी खाना खा सके त्योहारों में
    तभी तो भगवान खुद बिक जाते हैं बाजारों में


    ●शाम को थक कर टूटे झोपड़े में सो जाता है
       वो मजदूर, जो शहर में ऊंची इमारतें बनाता है।



शहर और गाँव

*शहर और मेरा गाँव*



शहर की रौंदती सडकों से

मेरे गांव की पगडंडियां अच्छी
शहर की तिकडमी बोलियों से
गांव की बोलियां सच्ची
नग्नता को दिखाती
चमकते शहर की चमकती लड़कियों से
मेरे गांव की छोरियां अच्छी ।
दमघोंटू शहर की
बिषैली आबोहवा से
ऐसे धुंए व जहर से ठीक
मेरे गांव के जंगलों की हवा अच्छी ।
शहर के बड़े शीश महलों से
पापों से भरी कोठियों से ठीक
बेहतर है मेरे गांव की
माटी की झोपड़ियां अच्छी ।
इंसान को इंसान न समझने वाले
किसी को प्रीत न करने वाले
मतलब से सम्बन्ध रखने वाले
झूठे बनावटी शहरों की जिन्दगी से
गांव की सीधी साधी जिन्दगी सच्ची ।

  • आपका दोस्त- राहुल पाल

मेरा गाँव

*मेरा गाँव*


शहर से लगा हुआ मेरा
प्यारा-सा गांव
गांव से जुड़ी हुई है
स्मृतियों की छांव

 छांव में छुपी हुई
अनेक कहनाइयां
जिसने तोड़ी हमेशा
जिंदगी की ‍वीरानियां

वह बचपन के झूले
वह गांव के मेले
वह ट्रैक्टर की सवारी
वह पुरानी बैलगाड़ी
वह पुराना बरगद का पेड़
वह खेत की मेढ़
वह चिड़ियों का चहकना
वह फूलों का महकना
पर धीरे-धीरे गांव
बहुमंजिली इमारत में
तब्दील हो गया
वह कोलाहल और
गाड़ियों के शोर से
लबरेज हो गया
शेष रह गया केवल
गाड़ियों का धुआं
जिसे देख परेशान
हर व्यक्ति हुआ
सूरज अब जमीं के
पास आ गया
भौतिकता का नशा
हर व्यक्ति पर छा गया
आदमी को आदमी से
न मिलने की है फुरसत
भाईचारा और इंसानियत
यहां कर रहे रुखसत
इस नए जंगल से
कोई अब तो निकाले
हे परमात्मा मुझे फिर से
मेरे पुराने गांव से मिला दे।

मैं गाँव हूँ

*( मैं गाँव हूँ )*

मैं वहीं गाँव हूँ जिसपर ये आरोप है कि यहाँ रहोगे तो भूखे मर जाओगे।
मैं वहीं गाँव हूँ जिस पर आरोप है कि यहाँ अशिक्षा रहती है
मैं वहीं गाँव हूँ जिस पर असभ्यता और जाहिल गवाँर का भी आरोप है
हाँ मैं वहीं गाँव हूँ जिस पर आरोप लगाकर मेरे ही बच्चे मुझे छोड़कर दूर बड़े बड़े शहरों में चले गए। जब मेरे बच्चे मुझे छोड़कर जाते हैं मैं रात भर सिसक सिसक कर रोता हूँ ,फिरभी मरा नही।मन में एक आश लिए आज भी निर्निमेष पलकों से बांट जोहता हूँ शायद मेरे बच्चे आ जायँ ,देखने की ललक में सोता भी नहीं हूँ, लेकिन हाय!जो जहाँ गया वहीं का हो गया।
मैं पूछना चाहता हूँ अपने उन सभी बच्चों से क्या मेरी इस दुर्दशा के जिम्मेदार तुम नहीं हो?
अरे मैंने तो तुम्हे कमाने के लिए शहर भेजा था और तुम मुझे छोड़ शहर के ही हो गए।मेरा हक कहाँ है? क्या तुम्हारी कमाई से मुझे घर,मकान,बड़ा स्कूल, कालेज,इन्स्टीट्यूट,अस्पताल,आदि बनाने का अधिकार नहीं है?ये अधिकार मात्र शहर को ही क्यों ? जब सारी कमाई शहर में दे दे रहे हो तो मैं कहाँ जाऊँ?मुझे मेरा हक क्यों नहीं मिलता? इस कोरोना संकट में सारे मजदूर गाँव भाग रहे हैं,गाड़ी नहीं तो सैकड़ों मील पैदल बीबी बच्चों के साथ चल दिये आखिर क्यों?जो लोग यह कहकर मुझे छोड़ शहर चले गए थे कि गाँव में रहेंगे तो भूख से मर जाएंगे,वो किस आश विस्वास पर पैदल ही गाँव लौटने लगे?मुझे तो लगता है निश्चित रूप से उन्हें ये विस्वास है कि गाँव पहुँच जाएंगे तो जिन्दगी बच जाएगी,भर पेट भोजन मिल जाएगा, परिवार बच जाएगा।सच तो यही है कि गाँव कभी किसी को भूख से नहीं मारता।हाँ मेरे लाल आ जाओ मैं तुम्हें भूख से नहीं मरने दूँगा। आओ मुझे फिर से सजाओ,मेरी गोद में फिर से चौपाल लगाओ,मेरे आंगन में चाक के पहिए घुमाओ, मेरे खेतों में अनाज उगाओ,खलिहानों में बैठकर आल्हा खाओ,खुद भी खाओ दुनिया को खिलाओ, महुआ, पलास के पत्तों को बीनकर पत्तल बनाओ,गोपाल बनो, मेरे नदी ताल तलैया,बाग,बगीचे  गुलजार करो,बच्चू बाबा की पीस पीस कर प्यार भरी गालियाँ,रामजनम काका के उटपटांग डायलाग, पंडिताइन की अपनापन वाली खीज और पिटाई,दशरथ साहू की आटे की मिठाई हजामत और मोची की दुकान,भड़भूजे की सोंधी महक,लईया, चना कचरी,होरहा,बूट,खेसारी सब आज भी तुम्हे पुकार रहे है। मुझे पता है वो तो आ जाएंगे जिन्हे मुझसे प्यार है लेकिन वो?वो क्यों आएंगे जो शहर की चकाचौंध में विलीन हो गए।वही घर मकान बना लिए ,सारे पर्व, त्यौहार,संस्कार वहीं से करते हैं मुझे बुलाना तो दूर पूछते तक नहीं।लगता अब मेरा उनपर  कोई अधिकार ही नहीं बचा?अरे अधिक नहीं तो कम से कम होली दिवाली में ही आ जाते तो दर्द कम होता मेरा।सारे संस्कारों पर तो मेरा अधिकार होता है न, कम से कम मुण्डन, जनेऊ,शादी और अन्त्येष्टि तो मेरी गोद में कर लेते। मैं इसलिए नहीं कह रहा हूँ कि यह केवल मेरी इच्छा है,यह मेरी आवश्यकता भी है।मेरे गरीब बच्चे जो रोजी रोटी की तलाश में मुझसे दूर चले जाते हैं उन्हें यहीं रोजगार मिल जाएगा ,फिर कोई महामारी आने पर उन्हें सैकड़ों मील पैदल नहीं भागना पड़ेगा।मैं आत्मनिर्भर बनना चाहता हूँ।मैं अपने बच्चों को शहरों की अपेक्षा उत्तम शिक्षित और संस्कारित कर सकता  हूँ, मैं बहुतों को यहीं रोजी रोटी भी दे सकता हूँ। मैं तनाव भी कम करने का कारगर उपाय हूँ।मैं प्रकृति के गोद में जीने का प्रबन्ध कर सकता हूँ।मैं सब कुछ कर सकता हूँ मेरे लाल!बस तू समय समय पर आया कर मेरे पास,अपने बीबी बच्चों को मेरी गोद में डाल कर निश्चिंत हो जा,दुनिया की कृत्रिमता को त्याग दें।फ्रीज का नहीं घड़े का पानी पी,त्यौहारों समारोहों में पत्तलों में खाने और कुल्हड़ों में पीने की आदत डाल,अपने मोची के जूते,और दर्जी के सिरे कपड़े पर इतराने की आदत डाल,हलवाई की मिठाई,खेतों की हरी सब्जियाँ,फल फूल,गाय का दूध ,बैलों की खेती पर विस्वास रख कभी संकट में नहीं पड़ेगा।हमेशा खुशहाल जिन्दगी चाहता है तो मेरे लाल मेरी गोद में आकर कुछ दिन खेल लिया कर तू भी खुश और मैं भी खुश।

एक अपील 🙏🏻🙏🏻

 एक विनम्र निवेदन:- दीपावली पर लगभग हर घर में श्री गणेश और लक्ष्मी जी की नई मूर्तियों की पूजा  होगी..  लेकिन,पुरानी मूर्ति का क्या होगा.. ? ...